रिपोर्टर मोहम्मद कैफ खान
रामनगर। प्रदेश में चुनावी सरगर्मी धीरे-धीरे तेज़ होने लगी है। चुनाव अभी भले कुछ समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक मंच सजने लगे हैं और जनप्रतिनिधि अपने अपने दमखम के साथ मैदान में उतरते दिखाई दे रहे हैं। प्रदेश में चुनावी हलचल के बीच जनप्रतिनिधि अलग अलग तरीकों से सक्रिय नजर आ रहे हैं। कोई जनता की समस्याओं को लेकर प्रशासन तक आवाज़ पहुंचा रहा है तो कोई आंदोलन और विरोध के जरिए मुद्दों को उठाने की तैयारी में है।
दरअसल यह दौर सिर्फ मुद्दों को उठाने का नहीं बल्कि ताकत दिखाने का भी है। किसके पीछे कितनी भीड़ है कौन कितनी “खोपड़ियों” को अपने साथ जोड़ पा रहा है इसी की गिनती अब शुरू हो चुकी है। राजनीतिक गलियारों में साफ कहा जा रहा है कि जो जितनी खोपड़ियों पर कब्ज़ा करेगा वही इस शहर का “राजा” बनने की दौड़ में आगे रहेगा। चुनावी मौसम में नेताओं का जनता के बीच आना कोई नई बात नहीं है। वर्षों से यही सिलसिला चलता आया है चुनाव से पहले वादों की झड़ी, जिम्मेदारियों की लंबी सूची और जनता के हर दर्द पर मरहम लगाने के बड़े बड़े दावे। लेकिन सवाल वही पुराना है कि क्या ये लड़ाई सिर्फ चुनाव तक ही सीमित रहती है?जनता आज भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं रोजगार के अवसर बढ़ती महंगाई और मूलभूत समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि जो नेता आज जनता के साथ सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं क्या वे आने वाले महीनों तक इन मुद्दों के लिए उतनी ही मजबूती से लड़ते रहेंगे या फिर मतगणना होते ही तस्वीर बदल जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी मौसम में जनता को सिर्फ भीड़ नहीं बल्कि सवाल भी बनना होगा। नेताओं से यह पूछना होगा कि वादों का हिसाब कब और कैसे पूरा होगा। फिलहाल प्रदेश का सियासी पारा चढ़ने लगा है। मंच सज रहे हैं भीड़ जुटाई जा रही है और भाषणों की धार तेज हो रही है। लेकिन अंत में फैसला उसी जनता के हाथ में होगा जो तय करेगी कि उसे सिर्फ बातों का जाल चाहिए या फिर हकीकत में बदलाव। अब देखने वाली बात यह होगी कि इस बार जनता किसके पक्ष में खड़ी होती है वादों के साथ या काम के साथ।


