रिपोर्टर मोहम्मद कैफ खान
रामनगर। उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर जहां सरकार रजत जयंती का जश्न मना रही है, वहीं दूसरी ओर प्रगतिशील भोजन माता संगठन ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। संगठन ने 9 नवंबर को रामनगर के शहीद पार्क में एक बड़ी सभा आयोजित करने का ऐलान किया है, जिसमें राज्यभर की भोजन माताएँ अपने हक की आवाज़ बुलंद करेंगी।भोजन माताओं का कहना है कि राज्य बनने के 25 साल बाद भी उन्हें मान-सम्मान और अधिकारों से वंचित रखा गया है। सरकारी स्कूलों में कार्यरत करीब 25 हज़ार भोजन माताओं को महज़ 3 हज़ार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है वो भी सिर्फ 11 महीने के लिए। आरोप है कि स्कूलों में तय जिम्मेदारियों से इतर उनसे सफाई, बच्चों की देखरेख और कई दूसरे काम भी कराए जाते हैं, और मना करने पर नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है। संगठन की अध्यक्ष शारदा ने कहा कि राज्य गठन की 25वीं वर्षगांठ पर हमें अपनी बदहाल स्थिति सरकार के सामने रखनी होगी। जिनके हाथों से बच्चों को भोजन मिलता है उन्हीं हाथों को आज भी उचित हक नहीं मिला। उन्होंने यह भी कहा कि कई स्कूलों में आज भी गैस चूल्हे की सुविधा नहीं है और भोजन माताओं को लकड़ी जलाकर खाना बनाना पड़ता है, जो अमानवीय स्थिति को दर्शाता है। सभा में क्लस्टर योजना के तहत स्कूलों के विलय का भी विरोध किया जाएगा। भोजन माताओं का कहना है कि इस योजना से न केवल ग्रामीण बच्चों की शिक्षा पर असर पड़ेगा, बल्कि हज़ारों भोजन माताओं की रोज़ी-रोटी भी खतरे में है। संगठन ने सरकार से तीन प्रमुख मांगें रखी हैं राज्य की सभी भोजन माताओं को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए
साल में पूरे 12 महीने वेतन दिया जाए,
और क्लस्टर योजना के जनविरोधी आदेश को रद्द किया जाए। शारदा ने कहा कि अब वक्त आ गया है जब उत्तराखंड की भोजन माताएँ एकजुट होकर अपनी मेहनत और अस्तित्व का सम्मान मांगेंगी।


