रिपोर्टर मोहम्मद कैफ खान
साल 2027 के चुनाव भले ही अभी दूर नजर आ रहे हों लेकिन सियासी पारा धीरे धीरे चढ़ने लगा है। नेता अब गलियों और चौपालों का रुख कर रहे हैं जनता के बीच बैठकर उनके दर्द सुन रहे हैं और बड़े बड़े वादों की झड़ी लगा रहे हैं। कोई कह रहा है सत्ता में आए तो विकास की गंगा बहा देंगे तो कोई हर समस्या का स्थायी समाधान देने का दावा कर रहा है। दिलचस्प यह है कि जो आज विपक्ष में हैं वो जनता के हमदर्द बनकर लड़ाई लड़ने का दावा कर रहे हैं जबकि जो सत्ता में हैं वो अपने पिछले कामों का रिपोर्ट कार्ड लेकर मैदान में उतर रहे हैं। लेकिन सवाल वही पुराना है क्या वादों की ये मिठास हकीकत में भी उतरेगी या फिर चुनाव खत्म होते ही जनता फिर से इंतजार की कतार में खड़ी नजर आएगी?
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर चुनाव में यही कहानी दोहराई जाती है। नेता चुनाव से पहले घर-घर पहुंचते हैं, समस्याएं सुनते हैं भरोसा दिलाते हैं लेकिन जैसे ही मतगणना पूरी होती है जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी भी धीरे धीरे गायब हो जाती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि 2027 का चुनाव सिर्फ वादों का मेला बनकर रह जाएगा या फिर इस बार जनता अपने मुद्दों पर ठोस जवाब और काम की मांग करेगी। फिलहाल सियासी बिसात बिछ चुकी है और जनता एक बार फिर वायदों और हकीकत के बीच फंसी हुई है।
चुनाव 2027


